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अनिंद्रा

आज से ठीक एक हफ़्ते बाद बिलट को फाँसी दे दी जाएगी । "क्यों किया था उसने ऐसा? उसे अपने माँ-बाप के बारे में सोचना चाहिए था। " मेरा मन बहुत दुखी था। बिलट के बारे में सोचते हुए मैं स्कूल जा रहा था । अचानक मेरे सामने आकर एक मोटरसाइकिल रुकी । मैनें भी अपनी साइकिल रोकने की पूरी कोशिश की। साइकिल की दोनों ब्रेक को ज़ोर से दबाया। साइकिल का संतुलन जाता रहा और मैं ज़मीन पर काफ़ी वेग से गिरा। " खुद तो मरेगा और मुझे फँसाएगा। साइकिल नही चला सकते तो रोड से दूर रहो।” बाइक सवार भुनभुनाया। मैं अपना दर्द उसको कैसे बताता? बिलट के अवश्यंभावी मृत्यु ने मुझे झकझोड़ कर रख दिया था। मैनें  तुरंत माफी माँगना मुनासिब समझा।  बाइक सवार भी मेरे आचरण से पिघल गया।  " बेटा साइकिल होश में चलाया करो। " बाइक सवार ने मुझे नसीहत दी। नसीहत देने के बाद मोटरसाइकिल सवार  चलता बना। मैनें   जमीन पर गिरी हुई साइकिल उठाई। ज़ोर से गिरने के कारण मेरी नई साइकिल में बहुत सारे दाग आ गये थे। मेरी साइकिल आज दस दिन पुरानी हुई थी। इस घटना से मेरा ध्यान बिलट से हट कर साइकिल पर आ गया। मैनें ध्यान से देखा तो पाया ...

सत्यनारायण की पूजा

नित्य आलोक, आलोक परिवार के एकलौते वारिस थे। उसके पिता समुद्र आलोक अच्छे सरकारी पद पर रहते हुए  रिटायर हुए थे। सामाजिक प्रतिष्ठा उन्हें विरासत में मिली थी। पढ़ाई ख़त्म करने के बाद गाँव के ही कालेज में उन्होंनें प्रख्याता की नौकरी कर ली।वसुदेव झा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनकी पुत्री नंदिनी  गुणी थी। नित्य के नौकरी लगने के ठीक एक साल के बाद नित्य और नंदिनी की शादी हुई। यथार्थ आलोक उनकी पहली संतान थे जिसका जन्म नित्य के विवाह के दो वर्ष बाद हुआ था। यथार्थ के मुंडन के 15 दिन बाद उसके  सहोदर सत्य आलोक का जन्म हुआ । आलोक परिवार  में  मुंडन जन्म के चार साल के बाद होता है। यथार्थ बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का छात्र था। वह हमेंशा कक्षा में अव्वल आता था। सत्य साधारण छात्र था। यथार्थ व्यवहार कुशल था, सत्य में व्यावहारिकता का अभाव था। गाँव के स्कूल से से दशवीं की परीक्षा पास करने के बाद कालेज की पढ़ाई करने के लिए यथार्थ को पटना भेजा गया। नित्य, यथार्थ की प्रगति से गद-गद थे, परंतु, सत्य को लेकर वो चिंतित रहते थे।  कॉमपेटीशन   के इस दौर में सा...

शायरी

मैं घायल हूँ; घाव उसके भी हरे हैं। मैं सर पे कफन बाँधे खड़ा हूँ; वो सब्र बाँधे खड़ा है।। इतनी सुबह उसके दरवाजे पे दस्तक दूं कैसे; उसकी तो रात बांकी है। अपनी तो होली बीत गई; उसकी तो ईद बांकी है।। तुम्हारे चेहरे पे, खौफ जम गया है; जेहन में सिर्फ, अच्छी खबर रक्खो। किसी को क्या खबर, रात आ चुकी है; तुम इस खबर को ;अभी राज रक्खो। कुछ मीठा सा खिलाती थी वो ; स्वाद के लिए थोड़ा नमक मिलाती थी वो ।  इतना लजीज दवा नहीं होता ;  दिल समझता था जहर खिलाती है वो ।। भांग खाने से शिवत्व नहीं मिलता है ; अमृत पान से अमरत्व नहीं मिलता है । तुमने कौन से भ्रम को आत्मसात कर रखा है ; मिथ्या के शुद्धिकरण से सत्य नहीं मिलता है ।। हां ये वही है समझ जाता हूं मैं ; उसकी आहट से समहल जाता हूं मैं । बेहकना चाहती हूं मैं आज की रात ;  तुम मिरे और करीब आ जाओ । शाम को बोलो ठहर जाए ;   अभी रात के पहलू में नहीं जाना है मुझे  । चुंबन, आलिंगन, छूअन ,कुछ भी नही चाहिए मुझे  ; तुम्हारे पास होने का एहसास ही काफ़ी है । तुमसे अकेले मिलना था, मैंने नीन्द को भगा दिया ; तुम भी...
मैं एक चोर हूँ, मैं एक मौन हूँ. आवाज़ को निगल लेता हूँ मैं. रात को चोरियाँ करता हूँ, दिन में तुम्हारी परछाई बन कर घूमता हूँ. कई बार ऐसा हुआ है: तपती धूप है, कोई बूढ़ा बेतरह दयनीय दशा में भाग रहा है, तुम अपने दुपहिए पर किसी दिशा मे भाग रहे हो. वो दिख जाता है तुमको, चंचल आँखे पहुँच जाती हैं वहाँ तक. मालूम नहीं क्या अनुभूति होती है तुम्हें. लेकिन अभिव्यक्त क्या करते हो तुम? मौन! रास्ते में मुरझाए पेड़ों को देखते हो तुम, पर शब्दहीन! कुछ बच्चे तुमको दिख जाते हैं सड़कों पर भीख माँगते हुए, लेकिन तुम चुप! तुम इबारत करते हो , बेहिसाब लिखते हो इनके बारे में इनकी आरती उतारते हो, लेकिन सड़क पर आते ही सब भूल जाते हो सब कुछ कागज़ी? निःशब्दता हमने आविष्कृत की , परिष्कृत की, व्यवह्रत की. सदियों से इस अभिव्यक्ति पर हमारा अधिकार है! पर यह समझ लेना चाहिए, तुम्हारी पहचान सिर्फ़ और सिर्फ़ आवाज़ है, तुम्हें ग्लानि होती है , शब्द हैं तुम्हारे पास. तुम्हें अन्याय लगता है, तुम शोर करो, तुम्हें हर्ष होता है , व्यक्त करो. # आलोक प्रकाश # साभार navotpal.blogspot. 

कभी पूछा तुमने,तुम ये क्यों करते हो?

कभी पूछा तुमने,तुम ये क्यों करते हो? क्यों बेकार बातों को तरजीह देते हो, क्यों अपने जमीर को सोने देते हो? लोकल के चौथी सीट के लिए लड़ने वालों की भीड़, पेट काट कर स्कूल पढ़ाने वालों की भीड़, अड्मिशन के लिए लंबे लाइन में लगने वालों की भीड़ सरकार को गालियाँ देनेवालों की भीड़, सरकार की तारीफ करनेवालों की भीड़। कभी पूछा तुमने,तुम ये क्यों करते हो? क्यों बेकार बातों को तरजीह देते हो, क्यों अपने जमीर को सोने देते हो? ऑडिटोरियम में सत्संग सुनने वालों की भीड़, नेताओं की इफ्तार पार्टी में शिरकत करनेवालों की भीड़, जान जोखिम में डाल के रैली जाने वालों की भीड़, 'अपने लोगों' को वोट डालने वालों की भीड़ दिमाग़ से नही दिल से सोंचने वालों की भीड़। कभी पूछा तुमने,तुम ये क्यों करते हो? क्यों बेकार बातों को तरजीह देते हो, क्यों अपने जमीर को सोने देते हो? सेकुलर और कम्यूनल लोगों की भीड़ शोशाल मीडिया में संभ्रांत बनने वाली भीड़, शोशाल मीडिया में जली कटी सुनाने वाली भीड़, आई सी यू में भर्ती दोस्त को भूल जाने वाली भीड़, बर्थडे के दिन दोस्त को याद ...

गमले का पौधा

तुम एक छोटे से गमले में थे, क़ैद करके मैने तुमको रखा था। हाँ पानी से सिंचता  था  तुम्हें, हाँ कड़ी धूप से बचाता था  तुम्हें। खुशी होती थी तुम्हें बढ़ता हुआ देख कर, मज़ा आता था तुम्हारे कोमल तन को छुकर जब घर टूटा मेरा, बारिश का मौसम था। दिन में धूप की गर्मी, रात में बेहिसाब पानी। घर वालों को आराम, बेघरों की परेशानी। गमाल अब टूट चुका था। चारों ओर अब मिट्टी ही मिट्टी थी। गर्मी मुझे तबाह कर रही थी,तुम्हें आबाद कर रही थी। बारिश तुम्हारे तने को मजबूत कर रहा था,मेरे तन को कमजोर कर रहा था। अब तुम पैधे से पेड़ बन रहे थे, मैं आदमी से बीमार  बन रहा था। अब तुम विशाल वृक्ष बन गये हो, मेरे लिए नया घर बन गये, जब मैं तुम्हारी छाँव मेंबैठता हूँ तुम मेरी गोद में फल गिरा देते हो । मीठा फल जो तुम झुरमुटों में छिपा के रखते हो, फल जो तुम्हारे आगोश में पकते हैं, उनमें स्वाद होता है,उनमें सुगंध होता है।

शहर वापसी

मैं अपने गाँव से मिलने गया था, कुछ दस एक बरस बाद गया था। मैं सिक्स लेन सड़क पर परेशान था, मैं दस फीट की सड़क को ढूँढ रहा था । ढूँढ रहा था मैं चाय की दुकान, दूध और इलायची वाली चाय, रंग वाली चाय। पानी वाली कड़वी चाय से मैं उब चुका था, पोखर और बाग देखने को तरस चुका था। मैं फ्लाइओवर क्रॉस कर चुका था, गाँव पीछे छूट चुका था। मैनें एक यू टर्न लिया , अचानक हमारे बगीचों के रखवार सलीम की नज़र मुझ पर पड़ी, अब उसका घर हाइवे से सटा था, कुछ उसकी ज़मीन हाइवे में समा गई थी। उसने मुझे अपने घर के अंदर आने को कहा, जैसे ही मैं गाड़ी से उतरा, हींग के छौंक की खुश्बू ने मुझे झकझोड़ा, ये खुश्बू शायद जीरे और लहसुन की छौंक के साए में गुम हो गया था। सलीम आधी धोती कमर के नीचे तक बांधता था, आधी सर पर बांधता था। उसके बेटे अनवर ने कमर में लूँगी बँधी हुई थी, सर पर टोपी पहना था। अनवर की अम्मी ने ठीक वैसी साड़ी बँधी थी जैसे मेरी माँ बाँधती है, हाँ उसके पत्नी के लिवास और मेरी बीवी के लिवास में बहुत फ़र्क था। सलीम ने आग्रह किया, बच्चा खाना खा लो फिर साथ हवेली चलते हैं। शायद...