शायरी

मैं घायल हूँ;
घाव उसके भी हरे हैं।
मैं सर पे कफन बाँधे खड़ा हूँ;
वो सब्र बाँधे खड़ा है।।

इतनी सुबह उसके दरवाजे पे दस्तक दूं कैसे;
उसकी तो रात बांकी है।
अपनी तो होली बीत गई;
उसकी तो ईद बांकी है।।


तुम्हारे चेहरे पे, खौफ जम गया है;
जेहन में सिर्फ, अच्छी खबर रक्खो।
किसी को क्या खबर, रात आ चुकी है;
तुम इस खबर को ;अभी राज रक्खो।


कुछ मीठा सा खिलाती थी वो;
स्वाद के लिए थोड़ा नमक मिलाती थी वो
 इतना लजीज दवा नहीं होता;
 दिल समझता था जहर खिलाती है वो।।

भांग खाने से शिवत्व नहीं मिलता है;
अमृत पान से अमरत्व नहीं मिलता है
तुमने कौन से भ्रम को आत्मसात कर रखा है;
मिथ्या के शुद्धिकरण से सत्य नहीं मिलता है
।।

हां ये वही है समझ जाता हूं मैं;
उसकी आहट से समहल जाता हूं मैं

बेहकना चाहती हूं मैं आज की रात;
 तुम मिरे और करीब आ जाओ

शाम को बोलो ठहर जाए; 
अभी रात के पहलू में नहीं जाना है मुझे 

चुंबन, आलिंगन, छूअन ,कुछ भी नही चाहिए मुझे ;
तुम्हारे पास होने का एहसास ही काफ़ी है


तुमसे अकेले मिलना था, मैंने नीन्द को भगा दिया;
तुम भी न आए,नींद भी रूठ गई

वो आते हैं, अपने रंग में हमें रंग जाते हैं;
 हम उनके रूखसार को कैसे छूएं
हया हम पे हावी है;
 हम उनको कैसे रंगे।।

बहुत शोर है शहर में ;
आने वाले खामोशी की तैयारी है शायद

हरेक अजनबी से पता पूछ रहा हूँ;
मैं अपनी लाश जलाने के लिए शमशान ढूँढ रहा हूँ

उसने हँसना छोड़ दिया;
मैने उसके मोहल्ले में जाना छोड़ दिया
उसने रोना शुरू किया;
मैने उसकी गलियों में जाना शुरू किया।।

चंद दिनों से पिटारे में बंद थी फुरसत;
चलो उसके साथ कुछ लम्हे गुजार लें

रातभर जाग कर करता रहा वो अपनी थाती की रखवाली ;
सुबह जब आँख लगी, उसकी संदूक उड़ा ले गया कोई


कुछ तो अलग है उसकी छुअन में;
दिन में आराम मिलता है ,रात को बेचैनी

उसकी सोहबत भाती थी ; उसकी चाहत नहीं थी मुझे  
उसकी चाहत होती तो शायद;उसे मेरी सोहबत सुहाती थी।।

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