भाई था वो मेरा
दरीचे से झाँको, दूर कुछ लाल सा दिखता है,
वो दूर पहाड़ी के पास शायद घर है उसका.
कौन सी गली में है ? बेशक मालूम है मुझको.
पता तो पूछना पड़ेगा ,कभी गया नही उसके घर.
जब से मैने होश सम्हाला,
उसने मुझे सम्हाला.
अपने माँ- बाप के गुजरने के बाद हम साथ साथ रोए.
मुसलसल दो चिताएँ जली,
चिता की भस्म और उसमें छिपी चिंगारी को जज़्ब कर लिया उसने
राख का डर ,आग की तपिश- मेरे अवचेतन मन को कभी नहीं छुआ.
भगवान का अवतार था मेरे लिए, भाई वो मेरा.
उसके आगोश में कितनी रातें सोया मैं
डरावनी ख्वाब थी जिंदगी, उसने तिलिस्म में तब्दील कर दी.
अपनी जवानी मेरे बचपन के नाम कर दी.
भाई नहीं था वो मेरा,
वो माँ थी मेरी, वो ही मेरा बाप था.
मेरे स्कूल जाने के बाद आफ़िस जाता था,
मेरे स्कूल से आने के पहले वापस आता था.
मालूम नहीं कैसे 'मेनेज' करता था
रोटियाँ सेकता था, उंगलियाँ जलती थीं,
सब्जियाँ काटता था ,उंगलियाँ कटती थीं
तरकारी पकाता था, मेरे जुठे तस्तरी धोता था.
कई बार उसने मेरे लिए अपना पेट काटा,
हर बार उसने मेरे लिए अपना पेट काटा
ये अमरूद के पेड़,ये लीची, ये आम,
सब उसकी ही निशानी हैं.
एक कमरा उसने माँगा था 'हमारे' घर का,
नहीं दिया मैंने उसको कुछ भी 'मेरे'घर का.
अब मुझे अपने फर्ज़ की याद आती है,
मुझे उसके आख़िरी सफ़र में शरीक होना है.
पता पूछते -पूछते मैं पहुँचा उसके घर तक,
उसकी डोली निकल चुकी थी तब तक,
ताउम्र उसने शादी नहीं की,
वो चल चुका था अब अपने साजन से मिलने.
मैं दूर से देख रहा था,
चार कंधे मिल चुके थे उसको.
पीड़ित कभी नही हुआ मैं उसके लिए,
मालूम नहीं क्या हो गया था मेरे भावावेश को?
क्यों नहीं हुआ था अब तक भावुक मैं?
सारी पीड़ा अब घनीभूत हो गई
लेकिन,आँखे सूख चुकी हैं मेरी,
कभी सदानीर हुआ करती थीं आँखें मेरी,
क्यों अब वो नम नहीं हो रही हैं ?
फूट फूट कर रोना चाहता हूँ मैं!
ज़ोर-ज़ोर से चीखना चाहता हूँ मैं!
क्यों अब वो नम नहीं हो रही हैं ?
फूट फूट कर रोना चाहता हूँ मैं!
ज़ोर-ज़ोर से चीखना चाहता हूँ मैं!
किसी कंधे पर सर रखना चाहता हूँ मैं!
कोई तो मुझको रुलाओ!
भाई था वो मेरा!
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