सत्यनारायण की पूजा
नित्य आलोक, आलोक परिवार के एकलौते वारिस थे। उसके पिता समुद्र आलोक अच्छे सरकारी पद पर रहते हुए रिटायर हुए थे। सामाजिक प्रतिष्ठा उन्हें विरासत में मिली थी। पढ़ाई ख़त्म करने के बाद गाँव के ही कालेज में उन्होंनें प्रख्याता की नौकरी कर ली।वसुदेव झा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनकी पुत्री नंदिनी गुणी थी। नित्य के नौकरी लगने के ठीक एक साल के बाद नित्य और नंदिनी की शादी हुई। यथार्थ आलोक उनकी पहली संतान थे जिसका जन्म नित्य के विवाह के दो वर्ष बाद हुआ था। यथार्थ के मुंडन के 15 दिन बाद उसके सहोदर सत्य आलोक का जन्म हुआ । आलोक परिवार में मुंडन जन्म के चार साल के बाद होता है।
यथार्थ बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का छात्र था। वह हमेंशा कक्षा में अव्वल आता था। सत्य साधारण छात्र था। यथार्थ व्यवहार कुशल था, सत्य में व्यावहारिकता का अभाव था। गाँव के स्कूल से से दशवीं की परीक्षा पास करने के बाद कालेज की पढ़ाई करने के लिए यथार्थ को पटना भेजा गया। नित्य, यथार्थ की प्रगति से गद-गद थे, परंतु, सत्य को लेकर वो चिंतित रहते थे। कॉमपेटीशन के इस दौर में साधारण विद्यार्थी के लिए जीविका के साधन जुगाड़ करना कठिन था। सत्य खेल कूद में अच्छा था। लेकिन नित्य का मानना था कि अच्छे रोज़गार के लिए और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा बरकरार रखने के लिए पढ़ाई में अव्वल आना जरूरी है। जब सत्य ने पाँचवीं कक्षा पास की तो सरकार ने खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए एक स्कालरशिप योजना शुरू की। चुने गये छात्रों का जिला स्कूल में एडमिशन होना था। जिला स्कूल इलाक़े का प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल था।
नित्य बाबू ने सोंचा, अगर सत्य का दाखिला जिला स्कूल में हो जाता है तो अच्छी संगति में सत्य कुछ अच्छा सीखेगा। सत्य के स्कालरशिप के लिए उन्होनें आवेदन कर दिया। मिथिला के करीब दो हज़ार छात्रों ने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था। सभी आवेदक छात्रों के बीच विविध प्रकार के खेलकूद स्पर्धा का आयोजन किया गया। चुने गये बीस छात्रों में सत्य का नाम भी था।
होस्टल रूम में सी ऑफ करने के बाद वापस जाते समय नित्य ने सत्य को व्यावहारिकता का उपदेश दिया ।“ बेटा भले ही तुम्हारा एडमिशन स्पोर्ट्स कोटा से हुआ है,लेकिन,तुम्हें पढ़ाई में ध्यान देना है। पढ़ाई में ध्यान देने से ही तुम्हें रोज़गार के बेहतर अवसर मिलेंगे। साथ ही तुम अगर पढ़ाई में अच्छा नहीं करोगे तो आलोक परिवऱ के प्रतिष्ठा के लिए भी अच्छा नहीं होगा।”
पटना में यथार्थ ने साइंस के साथ कालेज की पढ़ाई शुरू की। फर्स्ट ईयर की पढ़ाई के बाद प्रमोशन टेस्ट में उसे डिस्टिंक्शन मिला। पुत्र की प्रगति से नित्य प्रसन्न थे। उधर जिला स्कूल में एक साल के अब्ज़र्वेशन के बाद सत्य को क्रिकेट और हाकी खेलने के लिए चुना गया। स्कूल के ही दिनों में एक और बात स्पष्ट हो गई, सत्य में सही और ग़लत की समझ परिपक्व थी। स्कूल की परीक्षा में नकल नही करना,खेल में बेईमानी नहीं करना,कक्षा मे शिक्षक से झूठ नहीं बोलना सत्य की आदतों में शुमार था।
रोज सुबह साढ़े 5 से साढ़े 6 बजे तक सत्य के हाकी की ट्रेनिंग होती थी। शाम को 4 से 6 बजे तक क्रिकेट की ट्रेनिंग होती थी। सातवीं क्लास पास करने तक सत्य के क्रिकेट और हाकी खेलने के हुनर में काफ़ी निखार आ गया था। दोनों ही खेल की बुनियादी बातों से सत्य अब भली-भाँति परिचित हो गया था। पढ़ने लिखने में सत्य अभी भी साधारण विद्यार्थी था ।नित्य,सत्य की प्रगति से संतुष्ट नही थे।
इंटरमिडियेट की परीक्षा पास करने बाद यथार्थ का एडमिशन देश के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज में हो गया। आलोक परिवार के पैतृक आवास में नित्य और समुद्र को बधाई देने के लिए काफ़ी लोग जमा हुए थे। कालेज में एडमिशन होने के उपलक्ष में समुद्र ने सत्यनारायण की पूजा और सामूहिक भोज का आयोजन किया था। नित्य और नंदिनी पुत्र की उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहे थे। सत्य के स्कूल में गर्मी की छुट्टी शुरू हो गई थी। परिवार की खुशी में वो भी सम्मिलित था। यथार्थ का एडमिशन आन लाइन हो गया था।
फर्स्ट सेमेस्टर की पढ़ाई शुरू करने के लिए यथार्थ अपने घर से विदा हुआ। ट्रेन में यथार्थ को बैठाने के लिए पटना तक नित्य और नंदिनी साथ गए।“ सामाजिक प्रतिष्ठा को हासिल करने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत मेहनत किया है। उसे बरकरार रखना तुम्हारा दायित्व है। कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना। पढ़ाई के अलावा दूसरी किसी चीज़ पर ध्यान मत देना।” ट्रेन छूटने के तुरन्त पहले पिता ने पुत्र को नसीहत दी।
गर्मी की छुट्टियों के बाद सत्य स्कूल वापस चला गया। स्कूल में होने वाले ट्रेनिंग से सत्य के क्रिकेट और हॉकी में काफ़ी सुधार हुआ। सत्य का चयन डिसट्रिक्ट लेवेल अंडर फोर्टीन क्रिकेट टीम में हो गया। टीम में सेलेक्ट होने वाला स्कूल का वो अकेला छात्र था। स्कूल के प्रिन्सिपल ने एक ट्राफ़ी प्रदान कर उसे सम्मानित किया। नित्य किसी काम से दरभंगा गये तो वे सत्य से मिलने भी चले गये। सत्य ने पिता को ट्रोफी दिखाया।“ खेल में अच्छा करने से रोज़गार नहीं मिलता है बेटा। पढ़ाई पर ध्यान दो,वरना जिंदगी की दौड़ में पीछे रह जाओगे।” नित्य ने पुत्र को फिर से व्यावहारिकता का पाठ पढ़ाया। सत्य के क्रिकेट की प्रतिभा से डिस्ट्रिक्ट टीम के ट्रेनर काफ़ी प्रभावित था। ट्रेनर की बातें सत्य ध्यान से सुनता था और उस पर अमल करता था। जिला स्कूल के पचास छात्र दरभंगा और भागलपुर के बीच होने वाले मैच को देखने के लिए आए हुए थे। मैच देखने का सबसे बड़ा कारण सत्य का दरभंगा टीम में शामिल होना था। सत्य जब खेलने के लिए मैदान में उतरा तो जिला स्कूल के छात्रों ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। शुरुआत से ही सत्य काफ़ी आत्मविश्वास के साथ खेल रहा था। उसका खेल सभी को प्रभवित कर रहा था। अचानक एक गेंद ने बल्ले को छुआ और विकेटकीपर ने कैच लपक लिया। एम्पायर इसके बारे में कुछ निर्णय करते इसके पहले ही सत्य पवेलियन की तरफ़ जाने लगा। सत्य के इस आचरण से उसके चारित्रिक सबलता का पक्ष उजागर हुआ। मैच के बाद ट्रेनर ने सत्य को समझाया। “जब तक एम्पायर आऊट नही दे,पिच पर जमे रहना चाहिए।” सत्य,ट्रेनर के इस विचार से सहमत नहीं था। लेकिन,उसने ट्रेनर से इस विषय पर बहस नहीं किया।
दूसरे सेमेस्टर का रिज़ल्ट आ गया था। यथार्थ डिस्टिंक्शन के साथ पास हुआ था। नित्य ने पुत्र को जी भर के सराहा। समुद्र आलोक ने फिर एक बार सत्यनारायण की पूजा आयोजित की।
सत्य की छवि एक ईमानदार खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो गई थी। नित्य के पिता जब भी स्कूल जाते, स्कूल के प्रिन्सिपल सत्य की ईमानदारी और खेल की काफ़ी प्रशंसा करते थे। नित्य ने सत्य के लिए अपनी चिंता को प्रिन्सिपल के साथ कभी नहीं बाँटा।दसवीं की परीक्षा सत्य ने साधारण अंको के साथ पास की। उसी साल यथार्थ ने इंजिनियरिंग की परीक्षा डिस्टिंक्शन के साथ पास की। यथार्थ को एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिल गई। उधर सत्य क्रिकेट में अच्छा कर रहा था। उसका चुनाव अंडर 17 स्टेट लेवेल टीम में हो गया। इंटरमिडियेट की परीक्षा पास करने के बाद सत्य रेलवे में टिकट कलेक्टर के पद पर स्पोर्ट्स कोटा के अंतर्गत चयनित हुआ। साथ ही यथार्थ का भी चयन राज्य सरकार में इंजिनियर के पद पर हो गया।
हलाँकि राज्य सरकार में पे स्केल उसके वर्तमान पे स्केल से काफ़ी कम था। लेकिन,मिलने वाले रुतबा और उपरी आय के प्रबल संभावना को ध्यान में रखते हुए यथार्थ ने कंपनी की नौकरी छोड़ कर राज्य सरकार ज्वाइन कर लिया । सत्य जब रेलवे की नौकरी शुरू करने के पहले परिवार से मिलने गया तो पिता ने कहा, “बेटा आलोक परिवार के नाम को खराब मत होने देना। अभी कुछ दिन संयम से रहना उसके बाद कमाने की सोचना । ”
नौकरी के पहले 6 महीने ट्रेनिंग पीरियड था। रेलवे में क्रिकेट खेलने की अच्छी सुविधा थी। सत्य के क्रिकेट में इन 6 महीने में और निखार आया। उसका चयन सीनियर लेवेल टीम में हो गया। ट्रेनिंग के बाद सत्य की नियुक्ति एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन पर हो गई। पहले ही दिन सत्य आलोक ने एक बिना टिकट यात्री को पकड़ा। यात्री ने पचास का नोट आगे बढ़ाया। “किराया और फ़ाइन के साथ कुल 235 रुपये हुए”, सत्य ने यात्री की तरफ़ देखते हुए बोला। यात्री बोला आप रशीद मत बनाइए। बगल में खड़े दूसरे यात्री ने कहा।"टी सी साहब लेन-देन करके मामला निपटा लीजिए। सही ग़लत की समझ सत्य में अभी भी उतनी ही परिपक्व थी, उसने आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। विवश होकर यात्री को फ़ाइन देना पड़ा। धीरे धीरे यह बात सत्य के सहकर्मियों में फैल गई कि सत्य एक ईमानदार कर्मचारी है।
यथार्थ की छवि एक व्यावहारिक अधिकारी के रूप में स्थापित हो गई थी। सत्य और यथार्थ में एक बुनियादी अंतर था। यथार्थ में सही ग़लत की समझ अपरिपक्व थी। वो धन का किसी रूप में निरादर नहीं करता था। साथ ही उपरी आय का एक अच्छा ख़ासा हिस्सा अपने उपर के अधिकारी को पहुँचता था। उच्च अधिकारी और कॉनट्रेक्टर दोनों ही वर्ग के लोग यथार्थ के आचरण से खुश थे। यथार्थ ने गाँव में अपने पुश्तैनी घर के पास के ज़मीन के टुकड़ो को खरीदना शुरू कर दी । हरेक दो तीन महीने के बाद वो गाँव आता था और ज़मीन के एक टुकड़े की खरीददारी कर लेता था। गाँव में उसकी जयकार हो रही थी। हमारा समाज 'चोरी' के धन को भी सम्मान की नज़र से देखता है।
सत्य अपना कार्य पूरी निष्ठा के साथ करता था। अपने सहकर्मियों में वो 'वसूली बाबा' के नाम से मशहूर हो गया था। रेलवे ज्वाइन करने के बाद उसका चयन देश के एक जाने माने क्रिकेट एकेडमी में हुआ। एकेडमी में सत्य ने बहुत कुछ सीखा। दो महीने के क्रिकेट कोर्स के बाद सत्य ने फिर काम शुरू किया।साहब और उसके दो 'चमचे' प्लेटफार्म पर घूम रहे थे। सत्य ने उनसे प्लेटफार्म टिकेट माँगा।एक 'चमचा' भारी आवाज़ में बोला। " ये हमारे साहब हैं।" सत्य ने उत्तर दिया। “मैने परिचय नहीं टिकट माँगा है। ”साहब बोले। “ मैं टॅक्स डिपार्टमेंट’ में जोनल हेड हूँ,एक रिलेटिव को रिसीव करने आया हूँ। ” सत्य ने प्रतिउत्तर दिया । “ अच्छी बात है सर! मुझे अपना प्लेटफार्म टिकट दिखाइए।” सत्य के आचरण से ‘साहब’ का आत्मसम्मान आहत हुआ।उन्होनें तुरंत रेलवे के जोनल हेड को कॉल किया। “ सरजी! आपका स्टाफ मुझसे टिकट माँग रहा है, आप थोड़ा उससे बात कर लीजिए। ” “क्या नाम है तुम्हारा ? ” “ सत्य आलोक। ” सत्य ने उत्तर दिया। “साहब को छोड़ दो । आदमी की पहचान नहीं है तुमको क्या? ” सत्य के जोनल हेड ने उससे पूछा। “ टिकट नहीं है इनके पास” । सत्य ने उत्तर दिया। “मुझ से बहस करते हो! ऐसी जगह फेंक दूँगा जहाँ पानी भी नहीं मिलेगा। किसको रिपोर्ट करते हो तुम? साहब को तुरंत छोड़ दो। ” जोनल हेड ने सत्य को आदेश दिया। मजबूरन सत्य ने 'साहब' को जाने दिया। अगले ही दिन सत्य का ट्रांसफर एक सुदूर रेलवे स्टेशन पर कर दिया गया। सरकारी अधिकारी सरकारी सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति और अपने सबॉर्डिनेट को अपना हुकुम का गुलाम समझते हैं ।
क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने के लिए क्रिकेट प्राधिकरण ने क्लब क्रिकेट की प्रतियोगिता शुरू की। एक क्लब के सी. ई. ओ. संयोंगवश एक क्रिकेट मैच देख रहे थे जिसमें सत्य भी खेल रहा था। सत्य के खेल से सी. ई. ओ. इतना प्रभावित हुए कि उन्होनें सत्य को अपने क्लब से खेलने के लिए न्योता दे डाला। क्लब क्रिकेट की प्रतियोगिता टेलिवीजन में प्रसारित की गई। प्रत्येक खिलाड़ी को लोग नाम और चेहरे से पहचानने लगे। सत्य का प्रदर्शन काफ़ी प्रशंसनीय था। अगले साल के खेल के लिए एक क्लब ने एक मोटी रकम की बोली लगाकर सत्य को खरीदा। सत्य जब परिजनों से आशीर्वाद लेने अपने पैतृक आवास आ रहा था तो ट्रेन में लोगों ने उसे पहचान लिया। बहुत सारे लोगों को सत्य ने ऑटोग्राफ़ भी दिया।
सत्य की सफलता पर ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए सत्यनारायण की पूजा आयोजित की गई। ठीक उसी समय यथार्थ के सरकारी आवास पर छापा पड़ा और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप में पुलिस उसे गिरफ्तार करके ले गई।
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