अनिंद्रा
आज से ठीक एक हफ़्ते बाद बिलट को फाँसी दे दी जाएगी । "क्यों किया था उसने ऐसा? उसे अपने माँ-बाप के बारे में सोचना चाहिए था। " मेरा मन बहुत दुखी था। बिलट के बारे में सोचते हुए मैं स्कूल जा रहा था । अचानक मेरे सामने आकर एक मोटरसाइकिल रुकी । मैनें भी अपनी साइकिल रोकने की पूरी कोशिश की। साइकिल की दोनों ब्रेक को ज़ोर से दबाया। साइकिल का संतुलन जाता रहा और मैं ज़मीन पर काफ़ी वेग से गिरा। " खुद तो मरेगा और मुझे फँसाएगा। साइकिल नही चला सकते तो रोड से दूर रहो।” बाइक सवार भुनभुनाया। मैं अपना दर्द उसको कैसे बताता? बिलट के अवश्यंभावी मृत्यु ने मुझे झकझोड़ कर रख दिया था। मैनें तुरंत माफी माँगना मुनासिब समझा। बाइक सवार भी मेरे आचरण से पिघल गया। " बेटा साइकिल होश में चलाया करो। " बाइक सवार ने मुझे नसीहत दी। नसीहत देने के बाद मोटरसाइकिल सवार चलता बना। मैनें जमीन पर गिरी हुई साइकिल उठाई। ज़ोर से गिरने के कारण मेरी नई साइकिल में बहुत सारे दाग आ गये थे। मेरी साइकिल आज दस दिन पुरानी हुई थी। इस घटना से मेरा ध्यान बिलट से हट कर साइकिल पर आ गया। मैनें ध्यान से देखा तो पाया की साइकिल का एक स्पॉक भी टेढा हो गया है।
मेरे स्कूल पहुँचने के पहले ही मॉर्निंग प्रेयर शुरू हो चुकी थी। प्रेयर ख़त्म होने तक मुझे गेट के बाहर रुकना पड़ा। पहला पीरियड साइंस का था। " सबने अपना होमवॉर्क कॉम्पलीट किया?" सर ने आते ही सवाल किया। "यस सर!" मेरे सहपाठियों ने एक सुर में उत्तर दिया। मैंनें होमवॉर्क नही किया था। लेकिन, मैं चुप रहा। "चलो! आज अगला चैप्टर शुरू करते हैं ।" सर होमवॉर्क चेक करने के मूड में नही थे। मैनें राहत की साँसें ली ।
लंच ब्रेक के दौरान हमें मेंन गेट से बाहर जाने का मौका मिला। मेरे ग्रुप के सभी सहपाठी अपना अपना टिफिन बॉक्स लेकर पानी की टंकी के उपर चढ़ गये। टंकी एक छोटी सी पहाड़ी पर अवस्थित था और हमारे लंच करने का निश्चित जगह था। लंच के बाद हम लोग पहाड़ी से उतर कर नीचे आ गये और रोज़ की तरह हमने फुटबॉल खेली।
लंच ब्रेक के बाद हमलोग वापस क्लास में आ गये। सेकेंड हाफ़ का पहला पीरियड हिन्दी का था। घर वापस जाने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी थी। हिन्दी के पीरियड में जयशंकर प्रसाद की कविता का भावार्थ हमें समझाया जा रहा था। हिन्दी के सर ने पूरी कविता हमें समझा दी,सिवाय बीच की चार पंक्तियों के। उन चार पंक्तियों का अर्थ मुझे समझ में नही आ रहा था। " तुम लोगों को पूरी कविता समझ में आ गई ? " सर ने प्रश्न पूछा। " सर मुझे डाउट है। " मैनें वो चार पंक्तियाँ ज़ोर से पढ़ी। " सर! मुझे इसका अर्थ समझ में नही आया। " " कविता ऐसे टुकड़ों में समझ में नही आती है। पूरी कविता पढ़ो। बार बार पढ़ो। अर्थ अपने आप स्पष्ट हो जाएगा। हरेक पंक्ति का अर्थ समझना ज़रूरी नही है। कविता का सार समझो। " अपनी नाकामी को छिपाने के लिए सर कुतर्क कर रहे थे।
छुट्टी की घंटी बजने के पहले हमने घर जाने की तैयारी पूरी कर ली थी। घंटी के बजते ही मैं साइकिल स्टैंड की ओर भागा। मुझे यह डर सता रहा था की घरवाले साइकिल की दुर्दशा को ना भाँप लें। मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर को मैं उनसे छिपाना चाहता था। स्कूल से घर जाने में मुझे पंद्रह मिनट लगे। घर पहुँचते ही मैंनें स्कूल बैग बिस्तर पर फेंका। कपड़े बदलने के बाद मैनें नाश्ता किया और क्रिकेट खेलने चला गया। क्रिकेट खेलते समय बार बार मेरा ध्यान साइकिल पर जा रहा था। कहीं मेरी चोरी पकड़ी ना जाए। वैसे भी क्रिकेट टीम में मैं इसलिए था क्योंकि मेरे पास एक अच्छा बल्ला था। ज़्यादातर खिलाड़ी नौवीं या दशवीं क्लास के छात्र थे। एक मैं ही था जो सातवीं क्लास का छात्रा था। बैटिंग में मेरा नंबर कभी कभार ही आता था। जगह के अभाव में पिच की लंबाई बाइस गज के बजाए सोलह गज की होती थी । शाम को सात बजे क्रिकेट खेल कर मैं वापस घर आया और हिन्दी की की किताब खोलकर बैठ गया। गणित और विज्ञान की किताबों में मेरी रुचि कभी नहीं थी। हिन्दी और इतिहास की किताबें पढ़ना मुझे अच्छा लगता था। रात को दस बजे खाना खाने के बाद मैं सोने चला गया। बिस्तर पर जाते ही बिलट का दर्द मुझे फिर से सताने लगा। मेरी आखों से नींद गायब हो गई।
बिलट ने बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध किए थे। पूरे देश में पीड़ित परिवार के लिए सहानुभूति और बिलट के लिए नफ़रत की भावना थी। बलात्कार कितना बड़ा अपराध होता है, शायद इसकी समझ मुझे नही थी। किसी को फाँसी की सज़ा देना मुझे अमानवीय लगता था। करीब दो घंटे तक मैं बिलट के बारे में ही सोचता रहा। घड़ी में जब रात के बारह बजे तो नींद नही आने के कारण मैं परेशन हो गया। मैं चाह रहा था की नींद किसी तरह से मेरी आखों में आए , लेकिन नींद मेरी आँखों से दूर थी। मैनें बगल के कमरे में सोए अपने माँ-पापा को संकेत देना सही समाझा। मैंनें खाँसना शुरु किया। जब दस मिनट तक मैं खाँसा, मेरी माँ ने समझ लिया कि मुझे नींद नही आ रही है। उन्होने मुझे अपने कमरे में बुला लिया। कुछ देर के बाद मुझे नींद आ गई। रोज अपने माता पिता के साथ सोना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था।
कल सुबह बिलट को फाँसी पर ।लटका दिया जाएगा।- मेरी बेचैनी चरमसीमा पर थी। सुबह के अख़बार में इस पर विषय पर एक बड़ा सा लेख छापा था। किस तरह से बिलट ने अपने जुर्म को अंज़ाम दिया ? इस सन्दर्भ में विस्तार से लिखा गया था। लेख के साथ उसके माता- पिता की तस्वीर भी छपी थी। बड़े शहर से दो सौ किलोमीटर दूर एक गाँव में बिलट की बीवी,उसका पाँच साल का बेटा और उसके माता- पिता रहते थे। बड़ा शहर मेरे टाउन से पाँच सौ किलोमीटर दूर है। बिलट के माता पिता उसे बेगुनाह समझते थे।
बिलट एक कुशल कारीगर था। हथौड़े पर उसकी पकड़ काफ़ी मजबूत थी। कहाँ वार करना है और कितनी ज़ोर से करना है?- इसकी समझ उसे थी। रोज़गार के बेहतर अवसर की तलाश में वो गाँव से बड़ा शहर आया था। कुछ दिन उसने एक दुकान में कारीगर के रूप में काम किया,बाद में “फ्री लानसिंग” करने लगा। जहाँ भी उसने काम किया लोगों ने उसकी तारीफ की। अपार्टमेंट के "ए" विंग में उसने बहुत सारा काम किया था। अपार्टमेंट के "बी" विंग का काम जब शुरू हुआ तो बहुत से लोगों ने उसे एप्रोच किया। "ए" विंग में अभी दो परिवारों ने ही रहना शुरू किया था। उनमें एक पंद्रह साल की लड़की भी शामिल थी। -"स्वागतिका"। बिलट "सी" विंग में रहता था। "सी" विंग "अंडर कन्सट्रकशन” था। आते जाते लोगों को बिलट हमेशा दिखाई देता था। कभी भी किसी ने उसके चरित्र पर उंगली नही उठाई। "ए" विंग में रहने वाले शर्माजी का परिवार किसी काम से शहर के बहार गया हुआ था। घटना के समय स्वागतिका और उसकी मम्मी - दो लोग ही पूरे "ए" विंग में मौजुद थे। लिफ्ट में जाते समय बिलट ने स्वागतिका को कुछ सुँघा दिया। स्वागतिका बेहोश हो गई और बिलट के अन्दर के जानवर ने अपनी हवस कि आग बुझा ली। एक जघन्य अपराध को छिपने के लिए बिलट ने दूसरा जघन्य अपराध किया।- स्वागतिका को उसने जान से मार डाळा।
अपराध करने के बाद बिलट बेतहासा भागा। स्वागतिका को न्याय मिले इसके लिए मीडिया और प्रशासन एकजुट हो गए। देश में ये खबर जंगल के आग कि तरह फैल गई और बिलट पकड़ा गया। बिलट के गाँववालों को जब इसका पता चला तो उसके परिवार को बिरादरी से निकाल दिया गया। उसके बेटे छोटू को पाठशाला निकाल दिया गया। छोटू के बारे में सोंचकर मुझे बुरा लगा।
शाम को सभी न्यूज़ चॅनेल में बिलट के बारे में विस्तार से चर्चा हो रही थी। वो शाम को क्या खाने वाला है,उसकी आखरी इच्छा क्या है? "बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा”।- मुझे बहुत बुरा महशुस हो रहा था । बुझे मन से मैनें खाना खाया। खान खाने के बाद सभी अपने अपने बिस्तर पर लेट गए। मैं भी बिस्तर पर लेट गया। आज उसकी जिन्दगी की आखिरी रात है।कैसा महशूस कर रहा होगा वो? क्या वो सो पाया होगा? मैं रात भर करवटें बदलता रहा। सुबह होने के कुछ देर पहले मेरी आँखें लगी।
शाम को बिलट को फाँसी लगाए जाने कि खबर टी वी पर प्रसारित हो रही थी। सभी ने स्वागतिका और उसके परिवार के बारे में सहानुभूति व्यक्त की। बिलट के बेटे, बीवी या माता-पिता के बारे में किसी ने भी अपने विचार व्यक्त नही किए।बिलट के जान के साथ ही मेरे मन की बेचैनी भी जाती रही। काफी समय के बाद मैनें चैन कि नींद सोई।
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